मानगो मेयर चुनाव में बीजेपी का बड़ा दांव संध्या सिंह को समर्थन, पार्टी के भीतर मची खलबली
मानगो नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, सियासी तापमान अपने चरम की ओर बढ़ता जा रहा है। इसी बीच बीजेपी द्वारा नीरज सिंह की पत्नी संध्या सिंह को मेयर प्रत्याशी के रूप में समर्थन दिए जाने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। इस फैसले ने विपक्ष के साथ-साथ पार्टी के भीतर भी हलचल, असमंजस और असंतोष को हवा दे दी है

मानगो मेयर चुनाव में बीजेपी का बड़ा दांव संध्या सिंह को समर्थन, पार्टी के भीतर मची खलबली,कहीं विभीषण वाला हाल न हो जाए—अंदरखाने की बेचैनी उजागर
जमशेदपुर – मानगो नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, सियासी तापमान अपने चरम की ओर बढ़ता जा रहा है। इसी बीच बीजेपी द्वारा नीरज सिंह की पत्नी संध्या सिंह को मेयर प्रत्याशी के रूप में समर्थन दिए जाने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। इस फैसले ने विपक्ष के साथ-साथ पार्टी के भीतर भी हलचल, असमंजस और असंतोष को हवा दे दी है।
बीजेपी के इस कदम को लेकर स्थानीय राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। पार्टी के एक धड़े का मानना है कि संध्या सिंह को समर्थन देना सोची-समझी चुनावी रणनीति है, जिससे एक खास वोट बैंक को साधा जा सकता है।वहीं पार्टी के भीतर ही कुछ आवाज़ें इसे जोखिम भरा फैसला बताते हुए नाराज़गी जाहिर कर रही हैं।
बीजेपी के अंदरूनी हलकों में यह जुमला अब आम होता जा रहा है “कहीं विभीषण वाला हाल न हो जाए।” यानी आशंका यह कि कहीं यह फैसला पार्टी को बाहर से नहीं, अंदर से कमजोर न कर दे। कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं को डर है कि समर्थन का यह निर्णय अंदरूनी बगावत या निष्क्रियता को जन्म दे सकता है।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मानगो जैसे संवेदनशील और विविधतापूर्ण क्षेत्र में प्रत्याशी चयन बेहद संतुलन और जमीनी पकड़ के आधार पर होना चाहिए। ऐसे में बीजेपी पर परिवारवाद के आरोप भी लगने लगे हैं, जिसे विपक्ष बड़े चुनावी मुद्दे के तौर पर भुनाने की तैयारी में है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि बीजेपी भले ही बदलाव और नए नेतृत्व की बात करे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि राजनीति पुराने और परिचित चेहरों के इर्द-गिर्द ही घूमती नजर आ रही है । यह मुद्दा चुनावी प्रचार में बीजेपी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है
वहीं संध्या सिंह के समर्थक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि संध्या सिंह को केवल “नीरज सिंह की पत्नी” के रूप में देखना राजनीतिक संकीर्णता है। समर्थकों के मुताबिक वे लंबे समय से सामाजिक कार्यों से जुड़ी रही हैं और स्थानीय समस्याओं की गहरी समझ रखती हैं।बीजेपी का समर्थन मिलने से उनका दावा मजबूत हुआ है और वे मानगो के विकास को नई दिशा देने का भरोसा जता रही हैं।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार टिकट और समर्थन को लेकर कुछ वरिष्ठ नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं में असहमति है। यदि इस असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया, तो अंदरूनी विरोध या बगावत बीजेपी के लिए चुनावी नुकसान का कारण बन सकती है।
मानगो नगर निगम चुनाव अब केवल विकास के मुद्दों तक सीमित नहीं रह गया है। यह चुनाव बीजेपी के लिए पार्टी की एकजुटता बनाम अंदरूनी कलह की भी बड़ी परीक्षा बन चुका है। नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती येही है कि नाराज़गी को कैसे साधा जाए और संगठन को एकजुट रखा जाए।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बीजेपी का यह फैसला मास्टरस्ट्रोक साबित होता है या फिर आशंकाओं के मुताबिक पार्टी को ही “विभीषण वाला हाल” झेलना पड़ता है।
अंततः मानगो की जनता का जनादेश ही तय करेगा कि यह समर्थन विकास की राह खोलेगा या सियासी उलझनों को और गहरा करेगा




