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प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव 2026 का दूसरा दिन किताबों के दुनिया के साथ साथ ग्रामीण और आदिवासी विमर्श के नाम रहा

विभिन्न सत्रों के गंभीर विर्मश के पश्चात अंतिम सत्र में नीलोत्पल मृणाल के कविता की पंक्तियों में डूबे-उतराये दर्शक, युवा, किसान से लेकर देश-विदेश के समसामयिक विषयों पर गुदगुदाया और उनके विचारों ने झकझोरा

प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव 2026 का दूसरा दिन किताबों के दुनिया के साथ साथ ग्रामीण और आदिवासी विमर्श के नाम रहा

विभिन्न सत्रों के गंभीर विर्मश के पश्चात अंतिम सत्र में नीलोत्पल मृणाल के कविता की पंक्तियों में डूबे-उतराये दर्शक, युवा, किसान से लेकर देश-विदेश के समसामयिक विषयों पर गुदगुदाया और उनके विचारों ने झकझोरा

जमशेदपुर- देश के कई हिस्सों से आए साहित्यकारों और सुदूर क्षेत्रों से आए साहित्य प्रेमी और युवा श्रोताओं से भरे गोपाल मैदान जमशेदपुर के सभागार में प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव 2026 के द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र की शुरुआत लाइब्रेरी मैन संजय कच्छप की किताबों, पुस्तकालयों को लेकर चलाई जा रही मुहिम, समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व, जीवन-संघर्ष और जीवन उद्देश्यों को लेकर यदुवंश प्रणय से बातचीत से हुई। उन्होंने पहले पुस्तकालय खुलने की कठिनाई, समुदाय का उसको लेकर अविश्वास से लेकर आज झारखंड में 60 पुस्तकालय खुलने तक की यात्रा, किताबों के साथ ही वहां उपलब्ध डिजिटल सूचनाएं झारखंड के सुदूर क्षेत्रों में आज किस तरह लोगों की सोच, शैक्षणिक स्तर और जीवनशैली बदलने के जनांदोलन का रूप ले रहा है इस पर प्रकाश डाला।
आज के विभिन्न सत्रों में महादेव टोप्टो, प्रेमचंद उरांव, शिवशंकर उरांव, विनीत कुमर भगत, पद्मश्री पुष्पेश पंत, चंद्रहास चौधरी, डॉ सुरिंदर सिंह जोधका, अनुकृति उपाध्याय, अक्षय बहिबाला, शताब्दी मिश्रा, सौरभ रॉय, नीलोत्पल मृणाल ने अपनी बातें रखी

दूसरा सत्र- कुडुख भाषा पर साहित्य चर्चा

दूसरे सत्र में कुडुख भाषा पर साहित्य चर्चा हुई जिसमें महादेव टोप्पो, प्रेमचंद उरांव, शिव शंकर उरांव और विनीत कुमार भगत ने भाग लिया। महादेव टोप्पो ने कहा कि कोई भी भाषा छोटी नहीं होती है ।भले ही यूनेस्को ने कुडुख भाषा को विलुप्त प्राय भाषा की सूची में रखा हो लेकिन जिस तरह भाषा को लेकर युवाओं में उत्साह है यह भाषा विलुप्त नहीं होगी। उन्होंने अपने पुराने अभियान वाक्य कलम, कूची और कैमरा के साथ कंप्यूटर और कृषि को जोड़ते हुए इनके महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय की सभ्यता और संस्कृति को बचाने के लिए इन पर काम करना जरूरी है।

प्रेमचंद उरांव ने सीबीएसई में जनजातीय भाषाओं को लैंग्वेज कोड देने की मांग की ।उन्होंने कहा कि जब तक भाषा को रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक भाषा नहीं बचेगी। उन्होंने शिक्षकों को आह्वान किया कि रेल परीक्षा में भी जनजातीय भाषा में प्रश्न पत्र बनाने की कोशिश करें। डॉ विनीत भगत ने टीम धुमकुडिया के प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि भले ही यह शब्द कुडुख भाषा की है लेकिन इसका उद्देश्य सभी जनजातीय समुदायों को एक मंच पर लाना है और उनका विकास करना है। परिचर्चा का संचालन शिव शंकर उरांव ने किया।

तृतीय सत्र- Tasting Hoistory- इस सत्र में पुष्पेश पंत ने कहा कि भूख को तृप्ति देने के लिए हर आदमी की अपनी रोटी होती है। चंद्रहास चौधरी से स्वाद के इतिहास पर बातचीत करते हुए पुष्पेश पंत ने ऐतिहासिक प्रमाणों, दर्शन और समसामयिक समस्याओं से भोजन के संदर्भ को जोड़ते हुए कार्बनिक खाद्य सामग्रियों के नाम पर ग्लोबल कंपनियों द्वारा परोसे जा रहे मंहगे खाद्य सामग्रियों के षड्यंत्र से बचने और पुरानी खेती और खाद्य व्यवस्था की ओर लौटने की जरूरत पर बल दिया। बहुत ही बेबाकी से इतिहास, साहित्य और स्वाद का अनूठा संगम श्रोताओं को चखाते हुए उन्होंने कहा कि भोजन की विभिन्नताओं और स्वाद के स्तर पर झारखंड एक ही समय में इतिहास और वर्तमान के कई कालखंडों में जी रहा है। झारखंड का भोजन का खजाना रगड़ा, फुटका, खुकरी जैसे कई तरह के मशरूम, जनजातीय क्षेत्रों में सूखी पत्तियों से बनाए जाने वाले अनेकों तरह के सूप, यहां के जंगलों में पैदा अनेकों तरह के मसाले, महुआ का हलवा अचार चटनी मुरब्बा जैसे कई जनजातीय व्यंजन हैं जिन्हें सहेजने और इस विरासत को मिलावटी प्रभावों से बचाते हुए आगे की पीढ़ी तक ले जाने की जरूरत है। वर्तमान डिजिटल परिप्रेक्ष्य में फूड ब्लॉगिंग को करियर के रूप में अपना रहे युवाओं के बारे में बाते करते हुए कहा कि स्वाद के साथ-साथ भोजन के इतिहास, काल, परिवेश,उत्पत्ति और बनाने के तरीकों की जानकारी फूड ब्लॉगिंग को और भी गहरी और अर्थवान बना सकती है।

चौथा सत्र-पुस्तकों की यात्रा

चौथे सत्र में पुस्तकों की यात्रा विषय पर शताब्दी मिश्रा, सुरिन्द्र सिंह जोधका ,चंद्रहास चौधरी अनुकृति उपाध्याय,अक्षय बाहिवाला ने चर्चा की। परिचर्चा में चंद्रहास चौधरी ने कहा कि कुछ लोग किताब की तरह होते हैं। निजी पुस्तकालय एक तरह की आत्मकथा होती है। सफलता के लिए पुस्तकालय का होना जरूरी है। यह मानव सभ्यता के बंधुत्व का अहसास दिलाता है। सुरिंदर सिंह जोधका ने कहा कि किताबें इंसानियत का इतिहास है किताबों में कई पड़ाव होते हैं किताब की जिंदगी किताब से पहले शुरू हो जाती है। किताबों के जरिए ही है समाज को हम चला सकते हैं, किताबों का इतिहास इंसानियत से जुड़ा है।

अनुकृति उपाध्याय ने कहा कि किताबें रोटी की तरह जरूरी है, किताबों से मन पोषित होता है। किताबों के बीच रहना एक अलग अनुभव है। हर शब्द में शक्ति है। पुस्तकों से हममें चेतना आती है। शताब्दी मिश्रा ने कहा कि अभी भी कई लोग हैं जिन तक पुस्तकों की पहुंच नहीं है इसलिए वे 12 साल से मोबाइल बुक स्टोर चला रही हैं। उन्होंने लोगों से सवाल किया कि आपके आसपास हर चीज की दुकानें होती हैं ।किताबों की दुकान क्यों नहीं है। अक्षय बहिबाला ने तो कहा हम स्कॉटलैंड का शराब गांव-गांव तक पहुंचा सकते हैं लेकिन किताबें नहीं। उन्होंने इस तरह के उत्सव को गांव-गांव तक ले जाने की आवश्यकता बताई

पांचवें सत्र में जाति,वर्ग एवं समकालीन भारत में गांव पर सौरव रॉय एवं डॉ सुरिन्दर सिंह जोधका के बीच चर्चा हुई। गांव और शहर में हमेशा एक दूसरे पर निर्भरता रही है । उन्होंने हर स्तर पर असमानता को सबसे बड़ी समस्या बताया । उन्होंने गांधी और अंबेडकर का उदाहरण देते हुए विकासवाद को समझाया। उन्होंने कहा कि लोकल विस्डम का विश्वास करना जरूरी है । सौरव रॉय ने कहा कि धरती की सबसे जटिल समस्याओं का उत्तर हमारे जनजातीय लोगों के पास हैं। इसलिए उनके साथ संवाद जरूरी है

सातवें सत्र के पहले हृयू विंग की नीतू दूबे ने ग्लिटर आर्ट को प्रदर्शित किया।

नई पीढ़ी से संवाद जरूरी… नीलोत्पल मृणाल

नीलोत्पल मृणाल की कविताई पंक्तियों में दर्शक पूरी तरह डूबते-उतराते नजर आए। उनकी रचनाओं ने युवाओं, किसानों से लेकर देश-विदेश के समसामयिक विषयों तक को सहजता और संवेदनशीलता के साथ छुआ। कभी व्यंग्य तो कभी गहन भावनाओं के माध्यम से उन्होंने श्रोताओं को गुदगुदाया भी और झकझोरा भी, जिससे सभागार में विचार, संवेदना और संवाद की एक जीवंत लहर महसूस की गई। उन्होने कहा कि झारखंड का इतिहास संघर्ष का रहा है और नागरिकों का संघर्ष वहां से शुरू होता है जब सत्ता लोगों से जीवन जीने वाले आयामों को कठिन बना देती है। जहां प्रकृति, इंसानियत और पूंजीवाद के बीच तालमेल नहीं बैठता। नई पीढ़ी से सशक्त संवाद स्थापित करना बेहद जरूरी है। आलोचना करने से डरना नहीं चाहिए, वही आलोचना सुनने में बुरा नहीं लगना चाहिए । लेखन में संस्कृति, साहस और संघर्ष की बात होनी ही चाहिए। यह लेखन और जीवन की सबसे जरूरी तीन बातें है। जो काम प्रशासन और सरकार से छूट जाता है, वही बात करना साहित्यकार और पत्रकार का काम है, दायित्व है। क्योंकि जो काम हो रहा है, वह तो होर्डिंग और विज्ञापन लगाकर बताया ही जाता है जो नहीं हो रहा उसको बचाना हमारा काम है।

दूसरे दिन का समापन सांस्कृतिक संध्या से हुई जहां कस्तूरबा विद्यालय की छात्र-छात्राओं की प्रस्तुति, पाईका और जनजातीय नृत्यों ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।

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