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दीप प्रज्ज्वलित कर कवि सम्मेलन की शुरुआत करते जमशेदपुर पश्चिम के विधायक  सरयू राय

नशे में झूमती इनकी जवानी* *नहीं किसी के आंख में पानी चौथे बाल मेले में कवियों ने श्रोताओं को किया भाव विभोर

:दीप प्रज्ज्वलित कर कवि सम्मेलन की शुरुआत करते जमशेदपुर पश्चिम के विधायक  सरयू राय

नशे में झूमती इनकी जवानी* *नहीं किसी के आंख में पानी

चौथे बाल मेले में कवियों ने श्रोताओं को किया भाव विभोर

जमशेदपुर- चतुर्थ बाल मेले में शनिवार की शाम विद्वान कवियों ने विभिन्न रंगों से श्रोताओं को भिगो दिया। कवियों ने वीर रस, श्रृंगार रस की रचनाएं सुनाकर उपस्थित लोगों को तृप्त करने का प्रयास किया।

कवि सम्मेलन की अध्यक्षता सुरेश चंद्र झा ने की। मंच संचालन दीपक वर्मा ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने दीप प्रज्ज्वलित कर की। माधवी उपाध्याय ने सरस्वती वंदना की।

कवियित्री सुस्मिता मिश्रा ने पहली रचना पढ़ी।

दो में से तुम्हें क्या चाहिए
मोबाइल या मम्मी…।
यह आज के दौर को रेखांकित करने वाली दो पंक्तियां थी। उन्होंने समाज की सच्चाई को सामने रखा।
इसके बाद बसंत जमशेदपुरी ने अपनी रचना पढ़ी। मैं भारत के अमर शहीदों की कुर्बानी गाऊंगा…सच को मैं सच ही बोलूंगा, भले कहो तुम सरकारी…
जमशेदपुरी जी की इस कविता में वीर रस की भावना थी। उन्होंने अमर शहीदों की कुर्बानी को स्मरण किया।

इसके बाद उपासना सिन्हा ने एक गीत पेश किया, जिसके बोल थे: बैठ के सोचूं मैं पीपल की छांव, क्या पाया हमने छोड़ के गांव…दरअसल यह पलायन पर आधारित गीत था। इसमें पलायन की तकलीफ, दर्द, दंश का वर्णन था।

आज के दौर पर दुख जताते हुए कवियित्री कह रही हैं….नहीं किसी के सिर पे आंचल, नहीं किसी के पांव में पायल….अपनी गीत में उन्होंने आज के नौजवानों के ऊपर करारा प्रहार किया….
नशे में झूमती इनकी जवानी, नहीं किसी के आंख में पानी, संवेदना नहीं जन-मन में…..

इसके बाद मंच संभाला ज्योत्सना अस्थाना ने। उनकी रचना थी मेरे गीत वहीं तुम जाना, जा उनको गले लगाना, अपनों का स्नेह न पाया हो, लोरी बन उन्हें सुनाना, मेरे गीत वहीं तुम जाना… दर असल यह बिछड़े हुए बच्चों के दर्द को महसूस करती हुई रचना थी। ज्योत्सना जी ने जेल में 11 साल बच्चों को पढ़ाया है। स्त्री होने के नाते उनके मन में भी हूक सी उठी और यह गीत उन्होंने रच डाला।

इसके बाद श्यामल सुमन ने अपनी रचना पढ़ी। उनकी रचना थी: जीकर जीवन संघर्ष में, नव जीवन बन जाता है।
शब्द नर्तकी उलट कर देखो
कीर्तन बन जाता है।

माधवी उपाध्याय ने झारखंडी होने और भगवान बिरसा मुंडा को समर्पित रचना पढ़ी:
झारखंड की नींव बनाकर
मातृभूमि पर जान लुटाकर
देश हमारा, राज हमारा
बिरसा मुंडा के नारों ने
जोश भरा तीर चलाकर।

कवि सुरेश दत्त प्रणय की रचना भी शानदार रही। दीपक जी ने पुरानी पत्रिकाओं को ध्यान में रख कर एक रचना सुनाई:
अब पराग, नंदन कहां
कहां मधु मुस्कान।
लोटपोट चंदामामा,
और चंपक गुणगान।
इसके बाद सुरेश चंद्र झा ने अपनी रचना सुनाई:
वो राहें सुनी ही रहीं,
तेरी कदमों की जिन्हें तलाश थी। धन्यवाद ज्ञापन एस पी सिंह ने किया।

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